
सांचौर। जब देशभर में होलिका दहन की लपटें उठती हैं, तब डावल गांव एक अलग राह चुनता है। यहां होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, सिद्धांत और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। रियासतकाल से चली आ रही यह परंपरा आज भी उतनी ही दृढ़ है, जितनी सदियों पहले थी।
होलिका दहन नहीं, ‘प्रह्लाद’ की विजय का उत्सव
डावल के बिश्नोई समाज के लोग होलिका दहन में शामिल नहीं होते। उनका मानना है कि वे ‘प्रह्लाद पंथी’ हैं—अर्थात सत्य और भक्ति की विजय के प्रतीक। पौराणिक कथा के अनुसार जब होलिका ने भक्त प्रह्लाद को अग्नि में जलाने का प्रयास किया, तब ईश्वर की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे। इसी आस्था के कारण यहां होलिका दहन के दर्शन से भी परहेज किया जाता है।
समाज के आराध्य जाम्भोजी (जम्भेश्वर भगवान) को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। उनके सिद्धांतों—प्रकृति संरक्षण, सत्य और अनुशासन—को जीवन में उतारते हुए समाज पर्व को आध्यात्मिक स्वरूप देता है।
‘पाहल’ से शुरू होती है धुलंडी
धुलंडी की सुबह श्रद्धालु सामूहिक रूप से जम्भेश्वर चौकी पर ‘पाहल’ लेकर पहुंचते हैं। यहां पूजा-अर्चना और सत्संग के बाद ही रंगोत्सव की शुरुआत होती है। यह आयोजन बताता है कि डावल में होली की शुरुआत आस्था से होती है, न कि केवल उत्साह से।
रंग, खेल और सामुदायिक एकता
पूजा के बाद गांव की गलियां रंगों से सराबोर हो उठती हैं। डीजे की धुन पर युवा झूमते हैं, तो महिलाएं फागुन गीतों से माहौल को पारंपरिक रंग देती हैं।
दोपहर बाद मुख्य चौक में कबड्डी, रस्साकशी और बोरी रेस जैसी प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं। यहां जीत-हार से अधिक महत्व भागीदारी और सामूहिक उल्लास का होता है।
‘लूर’ में दिखी सांस्कृतिक चेतना
सैकड़ों महिलाओं ने पारंपरिक ‘लूर’ नृत्य प्रस्तुत कर यह संदेश दिया कि संस्कृति तभी जीवित रहती है, जब महिलाएं उसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाती हैं। ढोलक की थाप और लोकगीतों की गूंज से गांव का वातावरण देर शाम तक उत्सवमय रहा।
नई पीढ़ी निभा रही विरासत
ग्रामीणों का कहना है कि रियासतकाल से चली आ रही इस परंपरा को नई पीढ़ी पूरी निष्ठा से निभा रही है। बदलते दौर में भी डावल ने अपनी धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक पहचान से समझौता नहीं किया है।
इस अवसर पर जनप्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पुलिस प्रशासन की उपस्थिति ने आयोजन को व्यवस्थित और शांतिपूर्ण बनाए रखा।
डावल की होली यह साबित करती है कि त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि समाज की आत्मा और सिद्धांतों का प्रतिबिंब भी होते हैं। यहां रंगों के साथ आस्था भी उड़ती है, और उमंग के साथ परंपरा भी जीवित रहती है।



